मुहर्रम: यजीद ने पानी की बूंद-बूंद को तरसा दिया, फिर भी नहीं डगमगाया इमाम हुसैन साहब का काफिला

नई दिल्ली (शफ़ूरा ज़ीशान हैदर): दुनिया के विभिन्न धर्मो के बहुत से त्योहार खुशियों का इजहार करते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी त्यौहार हैं जो हमे सच्चाई और मानवता के लिए दी गई शहादत की याद दिलाते हैं। ऐसा ही त्यौहार है मुहर्रम, जो पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत की याद में मनाया जाता है। यह हिजरी संवत का प्रथम मास है। मुहर्रम एक महीना है जिसमें दस दिन इमाम हुसैन का शोक मनाया जाता है। इसी महीने में मुसलमानों के आदरणीय पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब मुस्तफा सल्लाहों अलैह व आलही वसल्लम ने पवित्र मक्का से पवित्र नगर मदीना में हिजरत किया था।

साल 2026 में मुहर्रम का खास महत्व है, क्योंकि यह इस्लामी वर्ष 1448 हिजरी की शुरुआत और आशूरा के पालन का प्रतीक है। हिजरी कैलेंडर चंद्रमा पर आधारित है, जिस वजह से मुहर्रम की तारीख दुनिया भर में चांद दिखने के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। सऊदी अरब और कई खाड़ी के देशों ने मुहर्रम की शुरुआत की पुष्टि कर दी है, जबकि भारत में मुहर्रम की तिथि स्थानीय स्तर पर चांद दिखने पर निर्भर करती हैं। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कई खाड़ी देशों में मुहर्रम की आधिकारिक पुष्टि 16 जून 2026 को की जा चुकी है, जो इस्लामी नए साल 1448 हिजरी की शुरुआत का प्रतीक है। हालांकि भारत में मुहर्रम की तिथि चांद दिखाई देने पर निर्भर करती है। आज यानी 17 जून से भारत में मुहर्रम की शुरुआत हो चुकी है। मुहर्रम का दसवें दिन मनाया जाने वाला आशूरा कई देशों में 25 जून को है, जबकि भारत में इसकी तारीख 26 जून, शुक्रवार को पड़ रही है।

रसूल मोहम्मद साहब की वफात के लगभग 50 वर्ष बाद इस्लामी दुनिया में ऐसा घोर अत्याचार का समय आया जब 60 हिजरी में हमीद मावीय के पुत्र याजीद राज सिंहासन पर बैठे। सिंहासन पर बैठते ही याजीद ने मदीना के राज्यपाल वलीद पुत्र अतुवा को फरमान लिखा कि तुम इमाम हुसैन को बुलाकर मेरी आज्ञाओं का पालन करने और इस्लाम के सिद्धांतों को ध्यान में लाने के लिए कहो। यदि वह न माने तो इमाम हुसैन का सिर काट कर मेरे पास भेजा जाए।

वलीद पुत्र अतुवा ने 25 या 26 रजब 60 हिजरी को रात्रि के समय हजरत इमाम हुसैन को राजभवन में बुलाया और उनको यजीद का फरमान सुनाया। इमाम हुसैन ने वलीद से कहा, “मैं एक व्यभिचारी, भ्रष्टाचारी, दुष्ट विचारधारा वाले, अत्याचारी, खुदा रसूल को न मानने वाले, यजीद की आज्ञाओं का पालन नहीं कर सकता।” इसके बाद इमाम हुसैन साहब मक्का शरीफ पहुंचे ताकि हज की पवित्र प्रथा को पूरा कर सकें। लेकिन वहां पर भी इमाम हुसैन साहब को किसी प्रकार चैन नहीं लेने दिया गया। शाम को बादशाह यजीद ने अपने सैनिकों को यात्री बना कर हुसैन का कत्ल करने भेज दिया।

हजरत इमाम हुसैन को पता चल गया कि यजीद ने गुप्त रूप से सैनिकों को मुझे कत्ल करने के लिए भेजा है। मक्का एक ऐसा पवित्र स्थान है कि जहां पर किसी भी प्रकार की हत्या हराम है। यह इस्लाम का एक सिद्धांत है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए कि मक्का में किसी प्रकार का खून-खराबा न हो, इमाम हुसैन ने हज की एक उप प्रथा जिसको इस्लामिक रूप से उमरा कहते हैं, अदा किया।

मुहर्रम मास की 2 तारीख 61 हिजरी को इमाम हुसैन अपने परिवार और मित्रों सहित कर्बला की भूमि पर पहुंचे और 9 तारीख तक यजीद की सेना को इस्लामिक सिद्धांतों को समझाया। लेकिन हजरत इमाम हुसैन की बातों का यजीद की फौज पर कोई असर नहीं हुआ और इमाम हुसैन को यातनाएं देना शुरू कर दिया। उनके साथ परिवार, बच्चे, बूढ़े बुजुर्ग सहित कुल 72 लोग थे। वह कूफे शहर की ओर बढ़ रहे थे, तभी यजीद की सेना ने उन्हें बंदी बना लिया और कर्बला (इराक का प्रमुख शहर) ले गई। कर्बला में भी यजीद ने दबाव बनाया कि उसकी बात मान लें, लेकिन इमाम हुसैन ने जुल्म के आगे झुकने से साफ इनकार कर दिया। इसके बाद यजीद ने कर्बला के मैदान के पास बहती नहर से सातवें मुहर्रम को पानी लेने पर रोक लगा दी।

हुसैन के काफिले में 6 माह तक के बच्चे भी थे। अधिकतर महिलाएं थीं। पानी नहीं मिलने से ये लोग प्यास से तड़पने लगे। इमाम हुसैन ने यजीद की सेना से पानी मांगा, लेकिन यजीद की सेना ने शर्त मनवाना चाहती थी। यजीद को लगा कि हुसैन और उनके साथ परिवार, बच्चे व महिलाएं टूट जाएंगे और उसकी शरण में आ जाएंगे, लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो 9वें मुहर्रम की रात हुसैन ने परिवार व अन्य लोगों को जाने की इजाजत दी और रात में रौशनी बुझा दी, लेकिन उन्होंने कुछ देर बाद जब रौशनी की तो सभी वहीं मौजूद थे और सभी ने इमाम हुसैन का साथ देने का इरादा कर लिया। इसी रात की सुबह यानी 10वें मुहर्रम को यजीद की सेना ने हमला शुरू कर दिया। सन 680 (इस्लामिक सन 61 हिजरी) को सुबह इमाम और उनके सभी साथी नमाज पढ़ रहे थे, तभी यजीद की सेना ने घेर लिया।

इसके बाद हुसैन व उनके साथियों पर शाम तक हमला कर सभी को शहीद कर दिया। तारीख के मुताबिक, यजीद ने इमाम हुसैन के छह माह और 18 माह के बेटे को भी मारने का हुक्म दिया। इसके बाद बच्चों पर तीरों की बारिश कर दी गई, इमाम हुसैन पर भी तलवार से हमले किए गए, इस तरह से हजारों यजीदी सिपाहियों ने मिलकर इमाम हुसैन सहित 72 लोगों को शहीद कर दिया। अपने हजारों फौजियों की ताकत के बावजूद यजीद, इमाम हुसैन और उनके साथियों को अपने सामने नहीं झुका सका। दीन के इन मतवालों ने झूठ के आगे सर झुकाने के बजाय अपने सर को कटाना बेहतर समझा और वह लड़ाई आलम-ए-इस्लाम की एक तारीख बन गई।

जंग का नतीजा तो जो हुआ वह होना ही था क्योंकि एक तरफ जहां हजरत इमाम हुसैन के साथ सिर्फ 72 आदमी थे वहीं दूसरी तरफ यजीद के साथ हजारों की फौज थी। नतीजा यह हुआ कि जंग में एक-एक करके हजरत इमाम हुसैन के सभी साथी शहीद हो गए आखिर में हुसैन ने भी शहादत हासिल की। इस्लामी इतिहास की इस बेमिसाल जंग ने पूरी दुनिया के मुसलमानों को एक सबक दिया कि हक की बात के लिए यदि खुद को भी कुर्बान करना पड़े तो पीछे नहीं हटना चाहिए।

इमाम हुसैन और उनके साथियों ने क्रूर शासक यज़ीद की जुल्म और तानाशाही के आगे झुकने के बजाए शहीद होना चुना था। सर्वोच्च बलिदान तक इंसानियत और सच के रास्ते पर चलने के इसी आत्मविश्वास ने महात्मा गांधी को गहरा प्रभावित किया था। कर्बला की त्रास्दी और हुसैन के बलिदान की छाप गांधी के ‘करो या मरो’ के नारे में नजर आती है। गांधी खुद कहते हैं, ”मैंने हुसैन से सीखा कि मज़लूमियत में किस तरह जीत हासिल की जा सकती है।” स्वतंत्रता संग्राम के पुरोधा गांधी ने कहा था, ”अगर मेरे पास हुसैन जैसे 72 साथी होते तो मैं 24 घंटे में भारत को अंग्रेजों से मुक्त करा देता।” इतना ही नहीं गांधी दुनिया भर में इस्लाम के प्रसार को हुसैन के बलिदान का एक नतीजा मानते हैं। हुसैन को महान संत बताते हुए वह कहते हैं, ”इस्लाम की बढ़ोतरी तलवार पर निर्भर नहीं करती बल्कि हुसैन के बलिदान का एक नतीजा है जो एक महान संत थे”

गांधी के अलावा हुसैन की शहादत को नेहरू, टैगोर और राजेंद्र प्रसाद भी याद कर चुके हैं। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो यहां तक मानते हैं कि हुसैन की शिक्षाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी सदियों पहले थीं। कर्बला के बलिदान को याद करते हुए पीएम मोदी ने कहा था, ”हम हज़रत इमाम हुसैन (अस) के बलिदानों को याद करते हैं और उनके साहस और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता को याद करते हैं। उन्होंने शांति और सामाजिक समानता को बहुत महत्व दिया।”

दक्षिण अफ्रीका के नेता नेल्सन मंडेला भी इमाम हुसैन की शिक्षाओं का पालन करते थे। नेल्सन मंडेला ने एक बार कहा था, “मैंने 20 से अधिक वर्ष जेल में बिताए हैं, और एक रात मैंने सरकार की सभी शर्तों और नियमों पर हस्ताक्षर करके हार मानने का विचार किया। हालाँकि, कर्बला आंदोलन और इमाम हुसैन (रह.) का ख्याल तुरंत मेरे मन में आया। इमाम हुसैन (रह.) के कारण ही मुझे स्वतंत्रता और मुक्ति के अधिकार के लिए लड़ने का साहस मिला, और मैंने ऐसा किया।”

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